13 मार्च को होली और 14 मार्च को धुलंडी, जानें शुभ मुहूर्त और परंपराएं

13 मार्च को होली और 14 मार्च को धुलंडी, जानें शुभ मुहूर्त और परंपराएं

सिरोही। होली का रंगों से सराबोर पर्व इस साल 13 मार्च 2025, गुरुवार को धूमधाम से मनाया जाएगा, जबकि धुलंडी 14 मार्च को मनाई जाएगी। ज्योतिष एवं वास्तुविद् आचार्य प्रदीप दवे के अनुसार, होलिका दहन का शुभ मुहूर्त रात्रि 11:29 से 12:06 तक श्रेष्ठ रहेगा, क्योंकि इससे पहले भद्रा का प्रभाव रहेगा।

होली का पौराणिक महत्व

होलिका दहन का पर्व भक्त प्रह्लाद और होलिका की कथा से जुड़ा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भक्त प्रह्लाद के भगवान विष्णु की भक्ति से असुर राजा हिरण्यकश्यप क्रोधित था। उसने अपनी बहन होलिका (जिसे अग्नि में न जलने का वरदान था) के साथ मिलकर प्रह्लाद को मारने की योजना बनाई। होलिका प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठी, लेकिन प्रभु की कृपा से होलिका स्वयं जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गए। तभी से बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है।

धुलंडी क्यों मनाई जाती है?

होली के दूसरे दिन रंगों से खेली जाने वाली धुलंडी को लेकर भी रोचक मान्यता है। होलिका और ईलोजी के प्रेम प्रसंग की याद में यह पर्व मनाया जाता है। कथा के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा के दिन ईलोजी की शादी होलिका से तय थी, लेकिन उससे पहले ही होलिका अग्नि में भस्म हो गई। इस दुख में ईलोजी धूल में लोटने लगे, जिसे देखकर लोग उनके साथ धूल खेलने लगे। यही परंपरा आगे चलकर धुलंडी के रूप में प्रचलित हुई।

गेर नृत्य और ढूँढ की परंपरा

गेर नृत्य और ढूँढ की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी है। मान्यता है कि जब कंस ने पूतना राक्षसी को गोकुल भेजा तो उसने नवजात शिशुओं को जहर देकर मारना शुरू कर दिया। इस संकट से बचने के लिए गोकुल के नौजवानों ने लाठियां लेकर पहरा देना शुरू किया। जब भगवान श्रीकृष्ण ने पूतना का वध किया, तो खुशी में सभी गोल घेरा बनाकर लाठियों के साथ नृत्य करने लगे, जिसे "गेर-नृत्य" या "डांडिया-नृत्य" के रूप में जाना जाने लगा। आज भी नवजात शिशुओं की रक्षा के लिए गेरिये ढूँढवाने की परंपरा निभाई जाती है।

भद्रा का महत्व और शुभ मुहूर्त

भद्रा एक करण है, जिसे अशुभ माना जाता है। भद्रा देवी का जन्म भगवान शंकर के क्रोध से हुआ था और यह राक्षसों के संहार का कारण बनीं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, भद्रा काल में शुभ कार्य वर्जित होते हैं, इसलिए होलिका दहन भद्रा समाप्त होने के बाद रात 11:29 से 12:06 के बीच किया जाना श्रेष्ठ रहेगा।

रंगों के त्योहार की तैयारियां जोरों पर

सिरोही सहित पूरे देश में होली की तैयारियां जोरों पर हैं। बाजारों में गुलाल, रंग, पिचकारी और तरह-तरह की मिठाइयों की धूम है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में गेर नृत्य, होली मिलन समारोह और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारियां भी जोरों पर चल रही हैं। इस बार भी होली को सुरक्षित और सौहार्दपूर्ण माहौल में मनाने की अपील की जा रही है।

संकेत में:

  • होलिका दहन मुहूर्त: 13 मार्च, रात 11:29 से 12:06
  • धुलंडी: 14 मार्च 2025
  • गेर नृत्य और ढूँढ की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।
  • भद्रा काल समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन करना शुभ माना गया है।

इस बार होली के रंगों में डूबने से पहले इस पर्व की पौराणिक और सांस्कृतिक मान्यताओं को जानना भी जरूरी है।
होली है...!


-------आचार्य प्रदीप दवे---------

   ज्योतिष एवं वास्तुविद्

               सिरोही





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